जैन आस्थाओं पर आंदोलन

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हमें याद नहीं आता कि कभी इतना व्यापक आंदोलन जैन समाज ने छेड़ा हो और नौबत सडक़ों पर बिछ जाने तथा क्रमिक अनशन तक की आ गई हो। शांत, संयमी, उद्यमी और अहिंसक जैनियों की आध्यात्मिक आस्थाओं पर प्रहार किया गया है। उनके दिव्य, भव्य और परम पावन तीर्थ ‘श्री सम्मेद गिरिराज’ को मांस-मदिरा, ऐशपरस्ती का अड्डा बनाने की कोशिश झारखंड सरकार ने की है, लेकिन सवालों के कटघरे में भारत की मोदी सरकार भी है। श्री सम्मेद शिखर तीर्थ ऐसा आध्यात्मिक स्थल है, जहां जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से 20 ने निर्वाण प्राप्त किया था। असंख्य जैन मुनियों ने भी इसी गिरिराज तीर्थ में तपस्या कर मोक्ष पाया था। जो भक्त वहां जाते हैं, वे उपवास धारण कर ही जाते हैं। श्री सम्मेद जैनियों के लिए ‘देवलोक’ तुल्य है। यह तीर्थस्थल 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की पहाडिय़ों के करीब 27 किलोमीटर क्षेत्र में फैला है, जहां विभिन्न तीर्थंकरों और देवी-देवताओं के करीब 850 मंदिर स्थित हैं। इस तीर्थस्थल की श्वेतांबर और दिगंबर जैनियों के लिए वही पवित्रता, महत्ता, दिव्यता है, जो मक्का-मदीना, येरुशलम, स्वर्ण मंदिर और वैष्णो देवी मंदिर आदि की है। फिर केंद्र और झारखंड सरकारें जैन समुदाय की आस्थाओं से खिलवाड़ कर ‘सम्मेद गिरिराज’ को पर्यटन स्थल, यानी मौज-मस्ती का अड्डा बनाने पर क्यों आमादा हैं? चूंकि पर्यटन स्थल विकसित किया जाना है, लिहाजा सरकारी अधिसूचना में मछली और मुर्गी पालन का उल्लेख है। पर्यटकों के लिए होटल, रिजॉर्ट बनेंगे, लिहाजा पेड़ों के अवैध कटान और खनन अभी से जारी हैं। वन-विभाग अलग-अलग संगठनों और कंपनियों को ज़मीन बेच रहा है, नतीजतन अभी से अतिक्रमण शुरू हो गए हैं।
बोर्ड तोड़ दिए गए हैं, असामाजिक तत्त्व सक्रिय हैं, वाहनों की आवाजाही बढ़ गई है, लिहाजा पर्यावरण छिल रहा है। सीसीटीवी को नष्ट किया जा रहा है। तीर्थ को खंडित भी किया जा रहा है। जैन समाज को घोर आपत्ति है कि पर्यटन स्थल घोषित करने से पहले जैनियों को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया? चूंकि पर्यटन स्थल बनाए जाने से ‘श्री सम्मेद शिखऱ’ की पवित्रता, दिव्यता, भव्यता से समझौते करने पड़ेंगे, जैनियों की आस्थाएं कुचली जाएंगी, लिहाजा अपने पवित्र तीर्थ को बचाने जैन समाज को सडक़ों पर उतरना पड़ा है। नौबत प्राणों की आहुति देने तक की आ गई है। दरअसल यह मुद्दा 2019 का है। तभी से जैनियों ने जंतर-मंतर पर धरना, रामलीला मैदान में जनसभा और कुछ प्रतीकात्मक अनशन के जरिए अपना विरोध दर्ज कराना शुरू किया था। जैन प्रतिनिधि सांसदों और मंत्रियों से भी मिले हैं। मुद्दा संसद में भी गूंजा है, लेकिन अब जैनियों ने राजधानी दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, रांची में सडक़ों पर उतर कर विरोध-प्रदर्शन किए हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ज्ञापन सौंपा गया है। जैन समुदाय घोर अल्पसंख्यक जमात है, जिसकी आबादी मात्र 2 फीसदी से भी कम है, लेकिन वे सबसे ज्यादा कर अदा करने वालों में आते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के गृहराज्य गुजरात से भी विरोध का एक अंधड़ उठा है। यह समुदाय भाजपा का परंपरागत जनाधार रहा है। यह आंदोलन अयोध्या के पुराने विवाद सरीखा स्वरूप ग्रहण कर सकता है। विहिप और साधु-संत जैनियों के तीर्थ को समर्थन दे रहे हैं। ओवैसी सरीखे मुस्लिमवादी नेता ने भी मांग की है कि इस फैसले को खारिज किया जाए। केजरीवाल ने कहा है कि जैनियों का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आगामी 4 जनवरी को मुंबई में एक विशाल मोर्चे का आयोजन किया जाना है, जिस दिन जैनियों ने अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान और शैक्षिक संगठन बंद करने का आह्वान किया है। यह मुद्दा दावानल की तरह भडक़ कर कहीं तक भी फैल सकता है। सरकारें किसी भी समाज और समुदाय के तीर्थों को छेड़ कर क्या हासिल कर सकती हैं? प्रधानमंत्री मोदी जैन समाज के प्रति बहुत संवेदनशील रहे हैं, लिहाजा उन्हें तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए।