सर्वाेच्च अदालत की संविधान पीठ ने नोटबंदी के फैसले को ‘संवैधानिक’ करार दिया है। ऐसा केंद्र सरकार का संवैधानिक अधिकार भी है। नवम्बर, 2016 से पहले भी दो बार नोटबंदी लागू की गई थी। नोटबंदी एक आर्थिक फैसला था, जिसे न तो पलटा जा सकता है और न ही अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। नोटबंदी केंद्र सरकार का मनमाना फैसला भी नहीं था। इस संबंध में सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच छह माह तक विमर्श किया गया, जो रिकॉर्ड पर है। रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 26 (2) के तहत भी केंद्र सरकार को नोटबंदी का अधिकार स्पष्ट है।
नोटबंदी का मकसद क्या था और उसे हासिल किया गया अथवा नहीं, इसका प्रक्रिया से कोई संबंध नहीं है। यह संविधान पीठ के फैसले का सारांश है। बेशक पीठ ने 4-1 के बहुमत से नोटबंदी के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन अब यही अंतिम और स्थायी संवैधानिक कानून माना जाएगा। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने बहुमत के फैसले पर असहमति जताई। उनकी टिप्पणी थी कि रिजर्व बैंक ने सरकार की इच्छा के अनुरूप काम किया। न तो नोटबंदी की राय दी और न ही सिफारिश की। फिर भी नोटबंदी कर दी गई, लिहाजा यह फैसला गैर-कानूनी है। जस्टिस नागरत्ना ने अपने फैसले में लिखा है कि नोटबंदी संसद में कानून पारित कर लागू की जानी चाहिए थी, न कि सिर्फ एक अधिसूचना जारी करके, लिहाजा नोटबंदी का कानून अवैध है। यह फैसला देते हुए संविधान पीठ ने अलग-अलग 58 याचिकाओं को खारिज कर दिया। बहरहाल अब बहसतलब मुद्दा यह हो सकता है कि नोटबंदी पर संविधान पीठ के इस फैसले के बाद विपक्ष और आलोचकों की बोलती बंद हो जानी चाहिए अथवा नहीं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता एक न्यायाधीश की असहमत टिप्पणी से ही चिपके हैं और नोटबंदी को अवैध, अनियमित करार दे रहे हैं। ऐसा स्पष्ट लग रहा है कि कांग्रेस को संविधान पीठ के बहुमती और विवेकपूर्ण फैसले और मान्य कानून से कोई सरोकार ही नहीं है। वे लगातार व्याख्या कर रहे हैं कि नोटबंदी ने देश की अर्थव्यवस्था को तबाह, बर्बाद, बेड़ागर्क और ध्वस्त कर दिया। यदि कांग्रेसियों को कुछ और पर्यायवाची शब्द याद होते, तो निश्चित रूप से उनका भी इस्तेमाल किया जाता। कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद राहुल गांधी विदेश तक में नोटबंदी पर दुष्प्रचार करते रहे हैं और आज भी उनकी राजनीति का हिस्सा बनी है।
अलबत्ता यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक स्थापित, तथ्यात्मक सत्य है कि भारत की अर्थव्यवस्था 6.5 फीसदी से ज्यादा विकास दर के साथ बढ़ रही है। दलीलें दी जा रही हैं कि यूपीए सरकार के दौरान 17 लाख करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा की नकदी चलन में थी और आज करीब 32 लाख करोड़ रुपए की नकदी मौजूद है, लिहाजा नोटबंदी नाकाम रही, क्योंकि नकद मुद्रा का चलन कम या सीमित नहीं किया जा सका। दरअसल ऐसी दलीलें देने वाले भूल जाते हैं कि देश की जीडीपी बढ़ रही है, लिहाजा मुद्रा का चलन बढऩा भी स्वाभाविक है। अलबत्ता पहले करीब 88 फीसदी लोग नकदी में लेन-देन करते थे, जो काफी घटकर 20-22 फीसदी तक लुढक़ आया है। साफ है कि लोगों ने डिजिटल लेन-देन को ग्रहण कर लिया है, नतीजतन नकदी चलन कम हुआ है। यदि आतंकवाद, नक्सलवाद, नकली नोट आदि प्रवृत्तियों को समाप्त करने और काले धन को जब्त करने पर विचार किया जाए, तो निश्चित तौर पर सभी की रीढ़ टूटी है। सरकार और एजेंसियों ने नेताओं, व्यापारियों और आईएएस अधिकारियों के परिसरों और अवैध ठिकानों से ‘नोटों के रंग-बिरंगे पहाड़’ जब्त किए हैं। यकीनन वह काला धन ही है। ऐसे सभी काले धनी जेल की सलाखों के पीछे हैं और अवैध नकदी सरकार के कब्जे में है। नवम्बर, 2016 में नोटबंदी के बाद उप्र में विधानसभा चुनाव हुए और 2019 में आम चुनाव कराए गए। दोनों में ही भाजपा को ऐतिहासिक, प्रचंड जीत हासिल हुई। राजनीतिक मुहर के बाद अब न्यायिक पुष्टि भी कर दी गई है। कांग्रेस दुष्प्रचार करने में व्यस्त न रहे और जीएसटी की भी गलत व्याख्या न करे। संभव है कि नोटबंदी में भी कुछ विसंगतियां होंगी, लेकिन बुनियादी तौर पर वह ‘संवैधानिक’ थी और आज भी है। विसंगतियों पर बहस जारी है। राफेल विमान सौदे के बाद पेगासस तथा अब नोटबंदी को लेकर फैसले से सरकार का पक्ष मजबूत हुआ है।









