पूर्ण राज्यत्व की पूर्णता

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आधी सदी का इतिहास और सबक हिमाचल के भविष्य की कल्पना में सुक्खू सरकार के अगले पांच साल के सफर को देख रहे हैं, लिहाजा अपने पहले शासकीय संबोधन में मुख्यमंत्री ने पूर्ण राज्यत्व दिवस का शृंगार किया है। सरकार ने ‘एरिया ऑफ एक्शन’ चिन्हित करते हुए पहले ही ग्रीन राज्य बनने का लक्ष्य निर्धारित कर रखा है, जबकि व्यवस्था परिवर्तन के तहत हिमाचल प्रदेश कर्मचारी चयन आयोग का निलंबन, सीमेंट उद्योग पर नकेल, मॉडल डे बोर्डिंग स्कूल तथा 101 करोड़ की सुख आश्रय जैसी दूरगामी योजनाओं का श्रीगणेश किया है। हिमाचल सरकार ने पूर्व में घोषित नौ सौ के करीब दफ्तर या सरकारी संस्थान बंद करके कडक संदेश दिया है, तो नई उपलब्धियां जोडने के लिए अपने मंत्रियों व मुख्य संसदीय सचिवों की टीम बनाई है। किसी भी सरकार से विकास की परंपराओं और कल्याणकारी योजनाओं की गिनती करते हुए हिमाचल ने कई मील पत्थर स्थापित किए हैं, लेकिन ये दौर खजाने पर इतने महंगे साबित हुए कि आज 75 हजार करोड़ का ऋण सारे इरादों को बांध देता है। जाहिर है कुछ फिजूलखर्चियां हुईं या सियासी तौर पर संसाधनों की बंदरबांट होती रही, जो आज आर्थिक तंगी के मुहाने तपने लगे हैं। अतरू सुक्खू सरकार के हाथ अगर आगे बढने का स्पष्ट संकेत दे रहे हैं, तो प्रदेश के पांवों में भारी ऋण की बेडियां जख्म पैदा कर रही हैं। ऐसे में हिमाचल को सख्त निर्देशों के तहत तमाम संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल ही नहीं करना, बल्कि निजी निवेश की सहभागिता से विकास और प्रगति को साझा भी करना है।
हिमाचल को मौजूदा अधोसंरचना का संरक्षण करते हुए ऐसा ढांचा विकसित करना है, जो रोजगार पैदा करता हुआ आर्थिकी को संबल दे। दुर्भाग्यवश पिछले कुछ दशकों से संसाधनों की खेती को कुछ सियासी परिंदे ही चट करते रहे, जबकि प्रदेश की समग्रता में आज भी कई तरह के असंतोष या रिसाव हैं जिन्हें भरना होगा। अगर सुक्खू सरकार पूरे प्रदेश की परिकल्पना में क्षेत्रवादी सोच को निरस्त कर पाई, तो इसके नतीजे राजनीति के प्रति जनता की सद्भावना बढ़ाएंगे। पूर्ण राज्यत्व की पूर्णता हासिल करने के लिए सरकारी कामकाज में सक्षम कार्य संस्कृति और निरंतरता चाहिए। मसलन कई अधूरी इमारतें पिछली सरकारों के दौर को भूल कर शर्मिंदा हो जाती हैं या हर बार कुछ नया करने की खोज में अतीत का खरा पक्ष छोड़ दिया जाता है। ऐसे में यह उम्मीद भी रहेगी कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू उन अधूरी इमारतों को सद्गति दें, जो राजनीतिक कारणों से झूल रही हैं या जिनके ऊपर खर्च किया गया धन अनुपयोगी साबित हो रहा है। हिमाचल की प्राथमिकताओं का आधार पुनरू नई कसौटियां तय कर रहा है और अगर हमें अगली मंजिलों का रास्ता मिल जाए, तो संकट कम होंगे या खोने का भय कम होगा। आर्थिक तौर पर हिमाचल को अगर संपन्न होना है तो पर्यटन, उद्योग, बागबानी, नवाचार व स्टार्टअप राज्य बनना पड़ेगा। यह सब तब होगा जब सोचने व करने का ढर्रा बदलते हुए विभागीय लक्ष्य तय होंगे। भविष्य के पाठ्यक्रम बदलने के लिए स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों का औचित्य खंगालना पड़ेगा। सरकार अगर पांच सालों में नए संस्थान खोलने के बजाय, वर्तमान को सशक्त कर दे तो सरकारी क्षेत्र में गुणवत्ता आएगी। प्रदेश में शिक्षा के लहजे को प्रमाणिकता तथा ताजगी देने के इरादे से मुख्यमंत्री ने तकनीकी ज्ञान बढ़ाने की ओर इशारा किया है। रोबोटिक्स, साइबर सुरक्षा, क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ब्लॉक चेन टेक्नोलॉजी जैसे विषयों पर वर्तमान सरकार कुछ खास करने की मंशा रखती है, लेकिन रोजगार और ज्ञान की उपलब्धियों के लिए ह्यूमैनिटीज के पाठ्यक्रम को श्रेष्ठता से जोडना होगा। प्रदेश में विज्ञान या इंजीनियरिंग कालेजों के बरअक्स कला महाविद्यालयों को उत्कृष्टता प्रदान करने की जरूरत है। हमारे लॉ कालेजों का पाठ्यक्रम तथा प्रैक्टिस सेशन कुछ इस तरह चलाए जाएं कि हिमाचल से केवल वकील नहीं, कानूनविद व जज पैदा हों। तकनीकी विश्वविद्यालय के तहत तमाम वाणिज्य कालेजों का स्तर उठाने की जरूरत है ताकि वहां डिग्री नहीं, उद्यमशीलता पैदा हो।