अब श्री सम्मेद ‘पवित्र’ रहेगा?

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यह जीत-हार का सवाल नहीं है। यह सद्बुद्धि, आस्था और संवेदनशीलता का संदर्भ है। जैन समाज के पवित्रतम तीर्थ ‘श्री सम्मेद शिखऱ’ को लेकर भारत सरकार को अपनी गलती का एहसास हुआ, तो पर्यटन स्थल बनाने का आदेश खारिज कर दिया। किसी भी क्षेत्र को ‘इको टूरिज़्म ज़ोन’ घोषित करने और उससे जुड़ी गतिविधियों की अनुमति देने का विशेषाधिकार भारत सरकार का ही है। राज्य सरकार को निर्देश का पालन करना होता है। यदि 2019 में झारखंड की तत्कालीन रघुवर दास सरकार ने जैनियों के अनन्य तीर्थ-शिखऱ को पर्यटन स्थल बनाने की सिफारिश मोदी सरकार को की थी, तो क्या भारत सरकार को जानकारी नहीं थी कि जैन समाज की आस्थामय भावनाएं उस गिरिराज से जुड़ी हैं? क्या जैन धर्म के 20 तीर्थंकरों ने उसी पारसनाथ शिखऱ पर निर्वाण प्राप्त किया था? झारखंड और केंद्र में भाजपा की ही सरकारें थीं, तो अधर्म का वह प्रयोग क्यों किया जा रहा था? दरअसल ‘तीर्थ’ और ‘पर्यटन’ में बुनियादी अंतर होता है। तीर्थ के मायने ‘तिरने’ से हैं। अर्थात जो व्यक्ति एक बार ‘सम्मेद शिखऱ’ में वंदना करने जाता है, उसकी ‘नरकगति’ समाप्त हो जाती है, ऐसी आध्यात्मिक मान्यता है। पर्यटन के मायने घुमक्कड़ी, मौज-मस्ती, मनोरंजन आदि हैं। इन दोनों शब्दों और संदर्भों का घालमेल कैसे संभव था? अब भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने राज्य सरकार को लिखित, अधिशासीय निर्देश दिए हैं कि श्री सम्मेद शिखऱ की पवित्रता और गरिमा बरकरार रखी जाए। वहां मांस-मदिरा के सेवन और बिक्री पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया जाए। उस क्षेत्र में तेज संगीत, नशीले पदार्थों, लाउडस्पीकर, कैंपिंग और टै्रकिंग पर भी पाबंदियां चस्पा की जाएं। पालतू जानवरों को भी ले जाने पर रोक लगाई जाए।
इस संदर्भ में जारी 2019 की अधिसूचना के खंड 3 के प्रावधानों पर तुरंत रोक लगा दी जाए। बल्कि सम्मेद गिरिराज के 10 किलोमीटर के दायरे वाले क्षेत्र को ‘नशामुक्त और शाकाहारी क्षेत्र’ घोषित किया जाए। केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया है कि तीर्थ-शिखऱ के लिए निगरानी समिति बनाई जाए, जिसमें जैन समाज के दो और जनजातीय समुदाय का एक प्रतिनिधि सदस्य के तौर पर रखा जाए। जैन मुनि इन निर्देशों के साथ भारत सरकार से एक और अनुग्रह कर रहे हैं कि गिरिराज को जैन समाज का ‘पवित्रतम धार्मिक तीर्थ क्षेत्र’ भी घोषित कर दिया जाए, ताकि भविष्य में कोई भी सरकार जैनियों की आस्थाओं से खिलवाड़ न कर सके। बहरहाल निर्णय और आदेश मोदी सरकार के हैं, लिहाजा राज्य सरकार उन्हें मानने और लागू करने को बाध्य है, लेकिन जैन समाज आनंदित, आभारी है और अख़बारों में विज्ञापन देकर उसने प्रधानमंत्री मोदी की कृतज्ञता व्यक्त की है और अभिनंदन भी किया है। प्रधानमंत्री के लिए कई विशेषणों का प्रयोग भी किया है। इतना शांत, विनम्र, विनयशील और अहिंसक है जैन समाज! यह अध्याय इतना विद्रूप ही नहीं होना चाहिए था। बेशक जैन समाज की आबादी 50 लाख के करीब है, लेकिन देश की जीडीपी में उसकी भागीदारी 20 फीसदी से ज्यादा है। वह 20 करोड़ से ज्यादा भारतीयों को रोजग़ार प्रदान करता है। शीर्ष, प्रमुख मीडिया समूह भी जैन उद्योगपति ही संचालित कर रहे हैं। जैनी कितना दान देते हैं और विभिन्न संस्थानों के संचालन में उनका सक्रिय योगदान है, इसके आंकड़े देश भली-भांति जानता है। दरअसल स्वतंत्र भारत में यह पहली बार हुआ है कि जैनियों के पवित्रतम तीर्थ को ‘अपवित्र’ और ‘अपमानित’ करने की कुचेष्टा की गई, नतीजतन जैन समाज को सडक़ों पर उतर कर आंदोलित होना पड़ा। दरअसल ऐसा किसी भी धर्म और आस्था के संदर्भ में नहीं होना चाहिए, क्योंकि संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक आस्था का अधिकार देता है, लेकिन सम्मेद के पारसनाथ पहाड़ के इर्द-गिर्द संथाल आदिवासी भी रहते हैं। उन्होंने आवाज़ बुलंद करना शुरू कर दिया है। भारत सरकार को इसे भी अविलंब हल करना पड़ेगा।